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UN इतिहास में पहली बार… सुरक्षा परिषद चुनाव में किर्गिस्तान जीता, जर्मनी हारा; भारत को चेतावनी 

UNSC Election 2026: संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के चुनावों ने इस बार कई बड़े संदेश दिए हैं. एक तरफ मध्य एशिया के छोटे से देश किर्गिस्तान ने पहली बार दुनिया की सबसे ताकतवर सुरक्षा संस्था में जगह बनाकर इतिहास रच दिया, तो दूसरी तरफ आर्थिक और राजनीतिक महाशक्ति माने जाने वाले जर्मनी को ऐसी हार मिली, जिसकी उम्मीद बहुत कम लोगों ने की थी. इन नतीजों ने न केवल 193 सदस्य देशों वाले संयुक्त राष्ट्र की बदलती राजनीति को उजागर किया है, बल्कि भारत की ओर से यूएन सुधार के लिए उठाए जा रहे विषयों पर भी सचेत किया है.

क्या हुआ चुनाव में?

3 जून 2026 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में सुरक्षा परिषद की पांच अस्थायी सीटों के लिए मतदान हुआ. इसके जरिए परिषद की पांच सीटें भरी गईं: अफ्रीका, एशिया-प्रशांत, लैटिन अमेरिका और कैरेबियन के लिए एक-एक सीट और पश्चिमी यूरोपीय और अन्य समूह के लिए दो सीटें. इन सीटों पर 2027-28 कार्यकाल के लिए नए सदस्य चुने गए. चुनाव के बाद जिन पांच देशों ने जीत हासिल की, उनमें शामिल हैं:

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  • किर्गिस्तान
  • पुर्तगाल
  • ऑस्ट्रिया
  • जिम्बाब्वे
  • त्रिनिदाद और टोबैगो

ये देश 1 जनवरी 2027 से सुरक्षा परिषद में अपना दो वर्षीय कार्यकाल शुरू करेंगे. ये पांचों देश पाकिस्तान, सोमालिया, ग्रीस, डेनमार्क और पनामा की जगह लेंगे, जिनका कार्यकाल दिसंबर 2026 में समाप्त हो जाएगा. 

पहली बार UN सुरक्षा परिषद पहुंचा किर्गिस्तान

इस चुनाव का सबसे बड़ा आकर्षण किर्गिस्तान की ऐतिहासिक जीत रही. 1991 में सोवियत संघ से अलग होकर स्वतंत्र देश बनने और 1992 में संयुक्त राष्ट्र का सदस्य बनने के बाद पहली बार उसे सुरक्षा परिषद में जगह मिली है.

एशिया-प्रशांत समूह की सीट के लिए उसका मुकाबला फिलीपींस से था. मुकाबला आसान नहीं था और चार राउंड की वोटिंग के बाद फैसला हुआ. अंततः किर्गिस्तान ने 142 वोट हासिल कर फिलीपींस को पीछे छोड़ दिया, जिसे केवल 49 वोट मिले.

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यह सिर्फ एक चुनावी जीत नहीं, बल्कि किर्गिस्तान की कूटनीतिक सफलता भी मानी जा रही है. राष्ट्रपति सदिर जापारोव और विदेश मंत्री जीनबेक कुलुबायेव पिछले कई महीनों से दुनिया के देशों से समर्थन जुटाने में लगे थे. किर्गिस्तान लगातार यह तर्क देता रहा कि उन देशों को भी सुरक्षा परिषद में प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए जिन्हें अब तक कभी मौका नहीं मिला, खासकर लैंड लॉक्ड और पर्वतीय देशों को.

जर्मनी को क्यों लगी इतनी बड़ी चोट?

चुनाव का दूसरा बड़ा घटनाक्रम जर्मनी की हार रहा. पश्चिमी यूरोप और अन्य देशों के समूह (WEOG) की दो सीटों के लिए जर्मनी, ऑस्ट्रिया और पुर्तगाल मैदान में थे. नतीजों में पुर्तगाल को 134 वोट मिले, ऑस्ट्रिया को 131 वोट मिले, जबकि जर्मनी सिर्फ 104 वोट ही जुटा सका. दो-तिहाई बहुमत की जरूरत होने के कारण उसकी दावेदारी खत्म हो गई.

यह हार इसलिए भी बड़ी मानी जा रही है क्योंकि जर्मनी यूएन में दूसरा सबसे बड़ा डोनर है. यही नहीं, जर्मनी इससे पहले 8 बार सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता के लिए चुनाव लड़ा था और हर बार वह सफल रहा था. 1990 में जर्मनी के एकीकरण के बाद यह पहली बार हुआ है जब वह सदस्यता हासिल नहीं कर सका. जर्मनी ने इससे पहले 2019-2020 के कार्यकाल के दौरान परिषद में सीट संभाली थी.

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क्या गाजा और यूक्रेन बने हार की वजह?

जर्मनी के विदेश मंत्री जोहान वेडेफुल ने चुनाव परिणाम को निराशाजनक बताया. उन्होंने संकेत दिया कि यूक्रेन युद्ध और गाजा संघर्ष पर जर्मनी के स्पष्ट रुख का असर वोटिंग पर पड़ा हो सकता है. जर्मनी के HABERLER न्यूज के विश्लेषकों का मानना है कि गाजा में इजराइल के समर्थन, यूक्रेन को लगातार सहायता और वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन के तरीकों पर अमेरिका की आलोचना सहित कुछ अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर जर्मनी की नीतियों ने कई देशों को उससे दूर कर दिया. जर्मन मीडिया रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि रूस ने जर्मनी की उम्मीदवारी के खिलाफ सक्रिय लॉबिंग की थी. मॉस्को लंबे समय से यूक्रेन को लेकर बर्लिन के रुख का विरोध करता रहा है.

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण हैं ये नतीजे?

इन चुनावों का असर भारत की दीर्घकालिक रणनीति पर भी पड़ सकता है. जर्मनी उस जी-4 समूह का सदस्य है जिसमें भारत, जापान, ब्राजील और जर्मनी शामिल हैं. यह समूह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य देशों की संख्या बढ़ाने की मांग करता रहा है.

ऐसे में जर्मनी का अस्थायी सीट तक न जीत पाना यह संकेत देता है कि संयुक्त राष्ट्र में समर्थन जुटाना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है. कई विशेषज्ञ इसे जी-4 देशों के लिए चेतावनी के तौर पर देख रहे हैं. हालांकि भारत ने चुनाव परिणामों का स्वागत किया है. संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि हरीश पर्वथानेनी ने सभी विजेता देशों को बधाई दी और उनके कार्यकाल में सहयोग का भरोसा दिया.

भारत पहले 2021-22 में सुरक्षा परिषद का अस्थायी सदस्य रह चुका है और 2028-29 कार्यकाल के लिए अपनी उम्मीदवारी भी पेश कर चुका है. लेकिन, जर्मनी की हार के बाद भारत को और अधिक सतर्कता बरतनी होगी. भारत यूएन में अपनी और ग्लोबल साउथ के साथी देशों की आवाज उठाता रहा है. ऐसे में मुश्किलें कुछ कम हो सकती हैं, लेकिन पूरी तरह निश्चिंत नहीं रहा जा सकता. 

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UN सुरक्षा परिषद का गणित क्या है?

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में कुल 15 सदस्य होते हैं. इनमें पांच स्थायी सदस्य हैं:

  • अमेरिका
  • रूस
  • चीन
  • ब्रिटेन
  • फ्रांस

इन पांच देशों के पास वीटो पावर है. इसके अलावा 10 अस्थायी सदस्य होते हैं, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र महासभा दो साल के लिए चुनती है. हर साल पांच सीटों पर चुनाव होते हैं ताकि क्षेत्रीय संतुलन बना रहे.

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Prakash Gupta

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और ग्लोबल लेवल पर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव के बीच, आज 4 जून को भारतीय तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की नई दरें जारी कर दी हैं. देश के प्रमुख शहरों में कीमतें काफी हद तक स्थिर हैं या उनमें केवल कुछ पैसे का ही बदलाव हुआ है.

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